कृष्ण आज भी दूर नहीं
मथुरा की कारा बोल उठी—
यह कैसी ज्योति निराली थी!
बेड़ी-पहरे के बीच जन्मकर,
मुक्ति की राह निकाली थी।
जन्मभूमि आज भी कहती—
अँधियारा चिरकाल नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
यमुना की उफनती लहरें,
चरण छूकर झुक जाती थीं,
वासुदेव की गोद बचाने,
रात स्वयं रुक जाती थी।
धीरज हो तो घोर विपद भी,
जीवन की अवरुद्ध राह नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
गोकुल की गलियों में कान्हा,
माखन चुरा मुस्काते थे,
यशोदा की उँगली थामे,
ईश्वर बाल बन जाते थे।
ममता से बढ़कर दुनिया में,
कोई सच्ची छाँह नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
नंदगाँव के खुले आँगन में,
गैया संग मुस्काते थे,
कान्हा ग्वालों की टोली लेकर,
वन-पथ धूल उड़ाते थे।
हर प्राणी में प्रभु बसते हैं,
कोई जीव असहाय नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
बरसाने की रंगीली होली,
राधा-रंग बरसाती थी,
नंदगाँव से कान्हा की टोली,
प्रेम-गुलाल उड़ाती थी।
रंग वही जो भेद मिटा दे,
केवल मुख की चाह नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
काम्यवन के सघन कुंज में,
लीला फूल खिलाती थी,
शांत सरोवर, शीतल छाया,
बंसी-तान सुनाती थी।
वन बचना भी धर्म हमारा,
केवल एक सलाह नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
गोवर्धन ने छत्र बनाकर,
ब्रज को दृढ़ आधार दिया,
कृष्ण की छोटी अँगुली ने,
संगठित बल का सार दिया।
प्रकृति-पूजन जीवन-दर्शन,
केवल पर्व-प्रवाह नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
राधाकुंड के शांत जलों में,
प्रेम स्वयं नहाता है,
श्यामकुंड के नील दर्पण में,
राधा-रूप समाता है।
दो नामों की एक धड़कन,
भेद-भाव की थाह नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
वृंदावन के कदंब तले जब,
कान्हा बंसी बजाते थे,
गैया, गोपी, वृक्ष, लताएँ,
एक सुर में आ जाते थे।
स्वर वह जो संसार जोड़ दे,
कलह भरी कोई चाह नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
निधिवन की झुकी लताएँ,
रास-कथा दोहराती हैं,
मौन निशा में आज भी जैसे,
पायल-धुन सुनवाती हैं।
श्रद्धा मन का दीप बने पर,
बुद्धि का तिरस्कार नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
ब्रज की चौरासी कोस धरा,
कण-कण राग सुनाती है,
रज की छोटी-सी कणिका भी,
कृष्ण-पथ पर लाती है।
ब्रज मन की वह निर्मल भूमि,
जहाँ कपट-अधिकार नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
उज्जयिनी का सांदीपनि-आँगन,
विद्या-दीप जलाता था,
कृष्ण-सुदामा दोनों को वह,
एक आसन पर लाता था।
शिक्षा जो संस्कार न दे पाए,
उस शिक्षा में सार नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
इंद्रप्रस्थ की राजसभा में,
नीति सदा आधार रही,
पांडव के संघर्ष-पथ पर,
कृष्ण-दृष्टि तैयार रही।
सत्ता का उद्देश्य सेवा,
केवल राज-अधिकार नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
कुरुक्षेत्र के मध्य खड़ा रथ,
अर्जुन-मोह सुनाता था,
गीता का उपदेश सुनाकर,
कृष्ण कर्म समझाता था।
ज्ञान वही जो कर्म बन सके,
शब्दों का भंडार नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
द्वारका की समुद्र-बाहें,
स्वर्णिम नगर सजाती थीं,
संकट से यदुवंश बचाकर,
नई शरण दिलवाती थीं।
धर्म बचाने का निर्णय भी,
कायरता या हार नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
मथुरा-जन्म, गोकुल-बचपन,
ब्रज ने प्रेम सिखाया था,
सांदीपनि ने ज्ञान सँवारा,
गीता ने कर्म जगाया था।
द्वारका तक हर पथ कहता—
कृष्ण किसी एक धाम नहीं।
युग बदले, पर प्रेम वही,
कृष्ण आज भी दूर नहीं॥
—संतोष कुमार शर्मा
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