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जिद्दी हैं हम फितरत से

                
                                                         
                            जिद्दी हैं हम फितरत से
                                                                 
                            
हर बार के घाव को सहने की औकात है
लोग कहते हैं हमें घमंडी
यह हमारे आत्मसम्मान की बात है

मोम की पिघलना आता नहीं हमको
आत्मा साफ रहे चाहे अकेले रहना पड़े हमको
झुकना आता अगर हमको तो कब के बिक जाते
सर उठाकर जीवन जीना है हमको

आदत है हमारी हम बड़े मगरूर रहे हैं
आंखों में सच्चाई का नूर लिए है
भीड़ का क्या
एक दिन नामोनिशान मिट जाएगा
इनमें कौन अपने असूलों पर खरे रहे हैं

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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