झूम के बरसो बरखा रानी...,ñ
दिल तरसे, मेरा मन तरसे...।
चोमासी प्यासीतप्त धरा का,
फिर भीगन को तन तरसे.....।
गरजो बदरा, बरसो बदरा.....।
"मधुवन " मे "मयूरा " नाच उठा...।
खाली भर दो "ताल -तलईयाँ",
"सूखे -कंठ " की प्यास बुझाने,
"चंचल मृगां " भाग उठा....।...
खेतों मे बीज़ों के अंकुर,
ऊपर उठने को तरसे.....।
झूम के बरसो बरखा रानी,
दिल तरसे मेरा मन तरसे....।
फूल खिले हैं, गुलशन -गुलशन...
बीते पतझड़ के मौसम,
ऋतु आयी बहारों वाली,
धरती के नज़ारों वाली,
जीव-जीव मे आस जगी है,
नभ से जैसे अमृत बरसे.....।
झूम के बरसो,बरखा रानी....,
दिल तरसे, मेरा मन तरसे......।
-शरद कुमार श्रीवास्तव.....।
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