आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जीवन - पथ

                
                                                         
                            जीवन कोई फूलों की सेज नहीं, काँटों का विस्तृत बाज़ार है। चेहरों पर मुस्कानों का मेला, भीतर हर मन बीमार है।
                                                                 
                            
रास्ते ऊँचे, राहें टेढ़ी, हर मोड़ नया व्यापार मिले। सच बोलो तो पत्थर मिलते, झूठ कहो तो सत्कार मिले।
राही लाखों मिलते जग में, पर साथी कितने होते हैं? जो कंधों पर हाथ धरते थे, विपदा में मुख मोड़ते हैं।
भोलों को सब मूर्ख समझते, चालाकों का सम्मान यहाँ। डाकुओं से गहरी यारी, सज्जन का अपमान यहाँ।
कल तक जिनको चोर कहा था, आज वही सरताज बने। सच की चौखट सूनी दिखती, झूठ सभी का ताज बने।
ईमानों की बोली सस्ती, झूठ बिके बाज़ारों में। सत्य अकेला रोता दिखता, छल बैठे दरबारों में।
रिश्तों का भी मोल लगाया, स्वार्थ हुआ पहचान यहाँ। दौलत के आगे झुकता देखा, बिकता हर ईमान यहाँ।
चलना है तो आँखें खोलो, हर चेहरा भगवान नहीं। हर मुस्कान विश्वास नहीं, हर रिश्ता वरदान नहीं।
मंज़िल उनको ही मिलती है, जो सत्य-पथ अपनाते हैं। झूठ के ऊँचे महलों वाले, अक्सर भीतर ढह जाते हैं।
-भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित 'भुवन'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर