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जीवन एक कुरुक्षेत्र है

                
                                                         
                            कुरुक्षेत्र की रणभूमि में, अर्जुन का मन डोल गया,
                                                                 
                            
अपने ही स्वजन सामने देखे, गांडीव हाथ से छूट गया।
रथ के मध्य खड़े केशव ने, मोह की हर दीवार गिराई,
कृष्ण-वचन से मन का कुहरा, ज्ञान-प्रकाश में घुल गया।
अर्जुन के प्रश्नों से जग को, जीवन-सत्य समझ आया है—
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, गीता ने मार्ग दिखाया है॥

देह समय की सीमा में है, आत्मा फिर भी अमर रहे,
अग्नि जला न सकती उसको, शस्त्रों से निष्प्रभाव रहे।
जैसे जीर्ण वसन को तजकर, मानव नया वसन धरता है,
तन बदलें पर आत्मतत्त्व का, अक्षय जीवन-सफर रहे।
मृत्यु नहीं है अंत यात्रा का, गीता ने यह समझाया है—
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, गीता ने मार्ग दिखाया है॥

कर्म तुम्हारा धर्म बने पर, फल की चिंता साथ न आए,
श्रम की निर्मल धार बहे पर, मन प्रतिफल में बँध न जाए।
हार मिले तो टूट न जाना, जीत मिले अभिमान न करना,
अपने हिस्से का दीप जलाते, कर्तव्य-पथ से मन न हट जाए।
निष्काम कर्म के बल पर ही, मानव ने उत्कर्ष पाया है—
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, गीता ने मार्ग दिखाया है॥

सुख आए तो मन मत उछले, दुख आए तो धैर्य सँवारे,
मान मिले अथवा अपमान, दोनों को समभाव गुज़ारे।
लाभ-हानि के झोंके आकर, अंतर्मन को डिगा न पाएँ,
जय हो चाहे हार सामने, मन समता-संकल्प सँवारे।
समता के इस दिव्य भाव को, योगी का आभूषण बताया है—
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, गीता ने मार्ग दिखाया है॥

चंचल मन तूफानी घोड़ा, विषयों की ओर भागता जाए,
इच्छाओं के पीछे दौड़कर, अपना ही सुख खोता जाए।
अभ्यासों की दृढ़ लगाम हो, वैराग्य हाथों में आ जाए,
इंद्रिय, मन और बुद्धि सँभलें, अंतर का कोलाहल मिट जाए।
जिसने अपने मन को जीता, उसने सारा जग जीत पाया है—
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, गीता ने मार्ग दिखाया है॥

काम हृदय में जन्मा तो फिर, क्रोध अग्नि बन बढ़ता जाता,
क्रोध विवेक जलाता है और, लोभ मनुष्य को बाँधता जाता।
इच्छा पूरी न हो तो मन से, स्मृति और संयम खो जाते,
धन जितना भी मिल जाए उसको, लोभी फिर भी तरसता जाता।
इन तीनों से मुक्त हृदय ने, सच्चा सुख-संतोष कमाया है—
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, गीता ने मार्ग दिखाया है॥

विराट रूप में कोटि सूर्य की, एक साथ आभा दिखाई,
एक देह में चर-अचर सारा, जन्म-मृत्यु की गति दिखाई।
काँप उठे अर्जुन के प्राण जब, सीमाएँ सब टूट रही थीं,
जिनको मित्र समझते आए, उनमें सृष्टि अनंत दिखाई।
कण-कण में परमात्मा बसता, विराट रूप ने समझाया है—
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, गीता ने मार्ग दिखाया है॥

पत्र, पुष्प, फल अथवा जल हो, मूल्य नहीं मन देखा जाता,
प्रेम और श्रद्धा से अर्पित, लघु उपहार भी प्रभु को भाता।
मंदिर केवल बाहर कब है, निर्मल हृदय स्वयं मंदिर है,
सेवा, करुणा, सत्य जहाँ हों, वहीं ईश्वर मिल जाता।
भक्ति में वैभव नहीं, भाव का सच्चा धन अपनाया है—
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, गीता ने मार्ग दिखाया है॥

धर्मों की उलझी राहों में, सत्य-शरण को ही अपनाना,
बुद्धि तर्क के वन में भटके, तब अंतर की ओर लौट जाना।
सारे भय और अहं समर्पित कर, परम सत्य की शरण में जाना,
पलायन नहीं समर्पण का अर्थ—कर्तव्य निभाकर शीश झुकाना।
पूर्ण समर्पण में ही मन ने, भय से सच्चा मोक्ष पाया है—
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, गीता ने मार्ग दिखाया है॥

युद्ध सदा कुरुक्षेत्र में ही हो, यह आवश्यक बात नहीं है,
हर मन में अर्जुन बैठा है, हर जीवन संघर्षमयी है।
दुविधा, भय, अन्याय, निराशा—आज नए आकार लिए हैं,
कृष्ण-वचन का दीप जले तो, कोई राह अँधेरी नहीं है।
जिसने गीता को जीना सीखा, उसने कृष्ण स्वयं पाया है—
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, गीता ने मार्ग दिखाया है॥
—संतोष कुमार शर्मा
 
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2 घंटे पहले

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