मोहब्बत है तो इतना फ़ासला रखते हो क्यों,
दिल में रखते हो तो मुझसे ही छुपाते हो क्यों।
मैं तुम्हारा हूँ—ये साबित भी करूँ कितनी दफ़ा,
हर नए मोड़ पे फिर इम्तिहान लेते हो क्यों।
मेरी ख़ामोशी में भी नाम तुम्हारा ही रहा,
फिर मेरे लफ़्ज़ों का इतना हिसाब रखते हो क्यों।
मेरी वफ़ा पे सवालों की इतनी भीड़ मगर,
अपनी वफ़ा को सवालों से बचाते हो क्यों।
मेरी ग़लती पे तुम्हें रिश्ता भी कम लगता है,
अपनी ग़लती को मोहब्बत का नाम देते हो क्यों।
इश्क़ में हार भी मंज़ूर है मुझको लेकिन,
मेरी हारों को ही अपनी जीत कहते हो क्यों।
मैंने हर दर्द तुम्हारा भी अपना मान लिया,
मेरे इक दर्द से तुम इतना घबराते हो क्यों।
मैंने माना कि मोहब्बत में झुकना पड़ता है,
सिर्फ़ मैं ही झुकूँ—ये शर्त लगाते हो क्यों।
तुमको जाना था, तुम्हें जाने दिया हँसकर भी,
अब मेरे सब्र को बेरुख़ी बताते हो क्यों।
टूटकर भी तुम्हें आवाज़ न दी जाते हुए,
प्यार इतना था कि जाने से तुम्हें रोका नहीं।
उसके जाने का मुझे आज भी अफ़सोस तो है,
जिसकी ख़ुशी थी मोहब्बत, उसे रोकता भी क्यों।
तुम किसी और के होकर भी अगर खुश हो कहीं,
फिर मेरी आँख में अपना ही ग़म ढूँढ़ते हो क्यों।
प्यार में हक़ है तुम्हारा—ये मुझे भी मंज़ूर,
हक़ को हर बार मगर हुक्म बनाते हो क्यों।
वक़्त मुश्किल हो तो रिश्तों की परख होती है,
वक़्त मुश्किल हो तो रिश्ता ही बदलते हो क्यों।
‘संतोष’ इश्क़ अगर दोनों तरफ़ ज़िंदा है,
एक ही दिल का हर बार इम्तिहान लेते हो क्यों॥
— संतोष कुमार शर्मा
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