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इंसानियत

                
                                                         
                            था तू मानव मनुष्य
                                                                 
                            
मिली तुझे मुझसे ये पहचान,

भूल बैठा है इंसान तू या मन बैठा खुद को भगवान है

बंद आँखों से तू निहारता,
समय से तू है हारता,
जाग और देख....
प्रत्यक्ष है तुझे पुकारता.

विफ़ल हुआ के सफल हुआ,
जीवन में जो दखल हुआ,
आवाज जो तूने चुनी,
क्या इंसानियत से थी बुनी?

छीन तूने सब उसके लिए.... हाथ खोल तूने क्या दिया? खड़ा हुआ आंख बंद कर देखा
देख इंसानियत का तूने क्या किया?

कौन है जो रह गया इंसान है?
या धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, शब्द ही महान् ह
है मनुष्य या देवता
या आज भी इंसान इंसानियत की पहचान है?
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