हयात ये रहा कि जीवन बीतता गया
कपड़े ख़त्म ना हुए
उसे बदलता रहा,
मैं तिथि और महीनों की तरह
जीते जी रहा ना कोई ग़म कपड़ों का ,
महज़ दोष सिर्फ़ रहा हयात का
हयात ये कि कपड़ा छोटा ,बड़ा , मोटा , पतला ,
विचार की तरह !
जिसे मैं बदलता रहा
सोम , मंगल , बुध , गुरु की तरह !
और अंतिम में कपड़ा बदल ना सका
हयात ये रहा कि
तन गड़ गया
और कपड़ा मात्र
एक
सफेद विचार बन कर रहा गया
हयात ये रहा कि जीवन बीतता गया ।
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