आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हार नहीं अंतिम सत्य जगत का

                
                                                         
                            हार नहीं अंतिम सत्य जगत का,
                                                                 
                            
जीवन का अंतिम विधान नहीं।
रूक जाना ही पराजय होती है,
संघर्षो का अवसान नहीं।
अंधकार चाहे घिर आए,
सूरज फिर भी उग आता है।
सूखी डाली का मौन हृदय भी
फिर हरियाली पा जाता है।
जो गिरकर फिर उठ खड़ा हुआ,
वही शिखरों का अधिकारी है।
आंसू जिसने पीकर हंसना सीखा,
वही समय का अच्छा साथी है।
पथ चाहे पथरीला हो,
साहस कभी थकने मत देना।
हर विफलता के गभ॔ में छिपे
नव-विजय को जन्म लेना है।
हार नहीं अंतिम सत्य जगत का,
आशा का दीप बुझने मत देना।
जब तक श्वासों में स्पंदन है,
स्वप्न अपने बिखरने मत देना।
-आलोक प्रकाश
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर