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ग़ज़ल ( घर में बन्द ... )

                
                                                         
                            घर में बन्द रहा करता है
                                                                 
                            
शायर बहुत नशा करता है
जैसे ज़िन्दगी से नाराज़ है
मर जाने की दुआ करता है
हां उस पे हंसता है ज़माना
वो दुनिया पे हंसा करता है
पागल हो जाने के अलावा
क्या कुछ और बचा करता है
मैं क्या अपनी फ़िक्र करूंगा
तू क्या क़त्ल किया करता है
सारे अहसासों के पीछे
सब महसूस हुआ करता है
तुम जिसको जो चाहे कह लो
कोई न हो कर क्या करता है
साया, सांसें, क़दम, रास्ते
कोई सफ़र तन्हा करता है
ये जो ज़िन्दगी है ये ही तो
कौन कहा इसका करता है
मुझको तन्हाई तो बख़्श दो
सन्नाटा बोला करता है
मैं अपनी धुन का आशिक़ हूं
ज़ेहन - ओ - दिल झूमा करता है
किसी से कोई बात करो तो
कोई बतलाया करता है
अपनी तमन्ना थी इक 'रंग' को
जाने क्या सोचा करता है
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3 महीने पहले

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