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तुम क्या फिर कुछ बोले 'रंग'

                
                                                         
                            जी बहलाना होता है
                                                                 
                            
और ज़िन्दगी में क्या है
अपना कौन पराया कौन
मानो दुनिया धोखा है
किससे कैसी बात करो
सब सब कोई जानता है
मैं अंजान ज़माने से
तुम ने क्या कुछ पूछा है
याद नहीं रहता कुछ भी
भूल भी जाना पड़ता है
जहां ज़िन्दगी ले जाए
मौत तलक ये सपना है
कौन करे किसकी परवाह
कोई किसी का कुछ क्या है
तन्हाई ही है जिसमें
मिलने वाला मिलता है
तुम क्या फिर कुछ बोले 'रंग'
कोई कुछ नहीं समझा है
- मृदुल
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एक घंटा पहले

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