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मैं बस एक मुसाफ़िर हूं

                
                                                         
                            मैं बस एक मुसाफ़िर हूं
                                                                 
                            
कटुआ हूं और काफ़िर हूं
तुम मुझको समझे ही नहीं
मैं ही पागल या फिर हूं
कोई ख़ुदा होता होगा
कुछ ईश्वर की ख़ातिर हूं
मैं मस्जिद की पूजा हूं
अज़ान देता मंदिर हूं
ये सबकुछ पागलपन है
जो जैसा हूं जाहिर हूं
चलो मोहब्बत करनी है
मैं तो इसमें माहिर हूं
यही हक़ीक़त है बस 'रंग'
जिसमें मैं भी हाजिर हूं
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2 महीने पहले

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