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मैं चाहूं भोग विलासिता, काम, क्रोध और वासना

                
                                                         
                            इस द्वंद्व युद्ध की धारा में,
                                                                 
                            
मैं बीच पड़ा मजधार में,
कोई पार लगाने आ जाए।
मैं बैठा, बंधा, जला इस ज्वाला में,
कोई वैराग मुझे समझा जाए।
मैं देखूं लोगों का अंतर्मन,
कोई दर्पण मुझे दिखा जाए।
मैं फंसा हुआ इस माया में,
कोई मुझको मार्ग दिखा जाए।
मैं बैठा भूखा जन्मों से,
कोई मेरी भूख मिटा जाए।
मैं करता नाटक जीवन का,
कोई मृत्यु मुझे सिखा जाए।
मैं क्रोधाग्नि से भरा हुआ,
अवसाद से मन है भरा हुआ,
द्वंद्वों से मैं हूं घिरा हुआ,
कोई शांत मुझे कर जाए।
मैं, मैं, मैं करता दिन भर मैं,
कोई मैं को मेरे दूर भगाए।
कोई पार लगाने आ जाए।
मैं चाहूं भोग विलासिता, काम, क्रोध और वासना ,
इनसे भरा बैठा मैं।
कोई चित्त शांत कर जाए,
कोई नैया पार लगा जाए।
इस द्वंद्व युद्ध की धारा में,
मैं बीच पड़ा मजधार में,
कोई पार लगाने आ जाए।
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2 महीने पहले

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