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बयार संग बहूँगी

                
                                                         
                            किसी दिन जब शब्द साथ न दें,
                                                                 
                            
कविता को मन से न गहूँ,
मैं कलम रख दूँगी,
कागज़ को दरिया में डुबो दूँगी।

उसी दरिया किनारे बैठ
घंटों दरख़्तों का झूमता यौवन निहारूँगी।।
चन्द्रकिरणों में मछलियाँ ढूँढ़ूँगी।
ठंडे पानी को हथेलियों में लेकर
कपोलों से लगाऊँगी।
चाँद को तकती रहूँगी,
तारों से चित्र उकेरूँगी,
टूटते तारे से एक मन्नत माँगूँगी।

इतना सब कुछ घटित होने के बीच
कोई भी कविता न खोजूँगी।
बस बयार संग बहती रहूँगी,
दरिया की लहरों-सी।
 
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2 महीने पहले

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