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बाढ़ का पानी

                
                                                         
                            बाढ़ का पानी
                                                                 
                            

वो अकेली ही मिली मुझे
उसके गांव से लगी पहाड़ी की चोटी पर,
हेलीकॉप्टर से गिराएं गए
खाने की चीजों का कनस्तर लिए हुए,
आदमीयों के सेकंड हैंड कपड़े पहने हुए -
मन के अंदर तक भिगी हुई सी
बाढ़ के पानी में सर से पांव तक रंगी हुई सी -
कुछ देर की आपबीती, पुंछने बतीयाने की रीति,
खुल गई मन से, तन से, दिल और दिमाग से,
जैसे बाढ़ का पानी धिरे धिरे रिसकर,
जमीन के अंदर अपनी जगह बना लेता है,
और,
नए नए कोमल कोंपलों को
सूरज की आग में तपने की सजा भी देता है -
कहने लगी,
पिछले साल से इस साल ज्यादा ही बरस गया
हमारा खेत, खलिहान और बांस का मकान
उखड़ गया, बह गया -
जीधर नजर डालो, ऊढाओ कदम रखने को
पानी-पानी, पानी और केवल पानी -
मन में, आंगण में, छत के ऊपर से बहता
पलकों के अंदर से झरता,
पेड़ के तने को डूबों कर,
पत्तियों की सरसराहट से मिलता,
आसमान से गिरता, कब्रिस्तान को भिगोता,
फूल की पंखुड़ियों को डराता, तो कभी
आंचल को गिराता, सांसों को फुलाता,
हर साल आता है ये पानी,
कभी काजल को फैलाता, कभी होश उड़ाता,
पानी -पानी और केवल पानी -
रंगहीन मोती जवाहर की जुबां से टपकता
हथेली पे रख भींच ले मुठ्ठी में, ओझल हो जाता,
ये पानी पानी और केवल पानी -
कहते कहते रुक गई वो, अकेली ही मिली थी मुझे,
मैंने पूछा,
जब हर साल का आना है, अपनों को खोना है,
बची उम्र भर का रोना हैं,
तो आने से पहले उसके
एहतियात क्यों नहीं बरतते हो आप ?
वो बोली,
बिल्कुल करते हैं सर, वो सारे इंतजामात -
उसके आने से पहले
घर की ऊंची अटारी पर अनाज रखते हैं,
कपड़ों को सिलकर, धोकर समेटते सहेजते हैं,
गेहूं, जव जवार का पिसान लाते हैं,
आने से पहले उसके, ऊंचे टीले पर
अपनी दुनिया बसाते है,
नव विवाहित जोड़ों को अलग अलग सूलाते है,
ताकि, प्रसव पीड़ा बाढ़ की पीड़ा को न बढ़ाएं,
बुढ़े मां बाप से कम खांसने को कहते हैं,
बच्चों को खेलने दौड़ने से जरा जरा रोकते हैं -
आपदा आने की दहशत में जीते हैं,
पल-पल रोते हैं, मुरझाते है,
फिर भी सदियों से यहीं बसते हैं,
यही रहते हैं, यहीं जीते और मरते हैं -
कुछ रुककर बोली वो, दोस्त
पल दो पल, हर साल यहां आते हो,
तस्वीरें, रिपोर्ताज, मुलाकाते लेकर चले जाते हो,
हम नहीं कहेंगे कभी भी, हमें साथ ले चलों,
क्योंकि,
हम यही रहेंगे, रहते आए हैं,
जिएंगे जिते आए हैं, और यह पानी आयेगा,
हर साल लेकर बाढ़ को अपने संग,
जैसे आते हैं इस देश में हर साल
पन्द्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी,
दिवाली, ईद, क्रिसमस, होली के रंग

-  विजय दयाराम मेश्राम
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2 महीने पहले

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