अपने अरमां निकालकर रखना
दिल को पत्थर में ढालकर रखना
इश्क़ तो बेवफ़ा भी होता है
अपने आंसू संभालकर रखना
ये सलीका नहीं है महफ़िल का
अपनी बातें उछालकर रखना
आग बुझने न पाए सीने की
दुश्मनी को यूँ पालकर रखना
ठीक बाहर नहीं ये चादर से
'मित्र' पैरों को डालकर रखना
-मित्र ग़ाज़ियाबादी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X