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अभी मंज़िल-ए-मक़सूद बाकी है

                
                                                         
                            अभी कहाँ टूटी हूँ मैं,
                                                                 
                            
अभी तो इम्तिहानों का सिलसिला बाकी है।
रेज़ा-रेज़ा होकर भी अपने वजूद को
नई सूरत में सँवारना बाकी है।

अभी कहाँ बिखरी हूँ मैं,
अभी तो गर्द-ए-वक़्त में खुद को तलाशना बाकी है।
हर ज़र्रे को समेटकर
अपनी पहचान फिर से बनाना बाकी है।

अभी कहाँ गिरी हूँ मैं,
अभी ठोकरों को अपना उस्ताद बनाना बाकी है।
हर गिरावट को सीढ़ी बनाकर
बुलंदियों तक जाना बाकी है।

अभी कहाँ जली हूँ मैं,
अभी दर्द की आग में तपकर
सोने-सा निखरना बाकी है।
हर ज़ख़्म को अपनी ताक़त का फ़साना बनाना बाकी है।अभी कहाँ ख़ामोश हूँ मैं,
अभी सब्र की रियाज़त और ख़ामोशी का हुनर बाकी है।
वक़्त को अपने हक़ में मोड़ने का
हौसला बाकी है।

अभी कहाँ हारी हूँ मैं,
अभी फ़तह की कई दास्तानें लिखनी बाकी हैं।
मेरी तक़दीर के पन्नों पर
कामयाबी की स्याही उतरनी बाकी है।

अभी कहाँ जी हूँ मैं,
अभी ज़िंदगी के हज़ारों मंज़र देखना बाकी हैं।
हर सुबह में एक नई उम्मीद,
हर शाम में एक नया सबक़ बाकी है।अभी कहाँ उम्र हुई मेरी,
अभी आधी ज़िंदगी का सफ़र बाकी है।
जो खो गया, वह तजुर्बा था;
जो मिलेगा, वह मेरा मुक़द्दर होगा।

अभी तो सफ़र-ए-हयात पर पहला क़दम रखा है,
अभी मंज़िल-ए-मक़सूद तक पहुँचना बाकी है।
मैं थक सकती हूँ, रुक नहीं सकती;
क्योंकि मेरी रूह में अभी पूरा आसमान बाकी है।


 
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2 महीने पहले

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