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आगे बढ़ते-बढ़ते

                
                                                         
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कच्ची गलियों वाला बचपन,
पीपल वाली ठंडी छाँव,
मिट्टी की सौंधी खुशबू थी,
छोटा-सा था अपना गाँव।

दुनिया पाने निकल पड़े हम,
कितना पीछे छूट गया,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

दादा की वो शाम की बातें,
दादी की मीठी मनुहार,
एक चूल्हे के चारों ओर था,
अपना सारा घर-परिवार।

रिश्ते सारे पास थे तब,
अब हर रिश्ता दूर हुआ,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

खेतों की पगडंडी छूटी,
सरसों वाला पीला रंग,
नहर किनारे शामें बीतीं,
बचपन वाले सारे संग।

ऊँची सड़कें मिलती गईं पर,
मिट्टी से नाता टूट गया,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

गाँव से निकले शहर की ओर,
कुछ ख़्वाबों का हाथ लिए,
नई राह, नई उमंगें लेकर,
बेहतर कल की आस लिए।

मंज़िल थोड़ी पास हुई तो,
अपना आँगन दूर हुआ,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

शहर से फिर महानगर आए,
कदम हमारे तेज़ हुए,
घर कुछ ऊँचा, जीवन बेहतर,
ख़्वाब हमारे और बड़े हुए।

सुख-सुविधाएँ बढ़ती गईं पर,
मन का सुकूँ कहीं खो गया,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

सुबह घड़ी के साथ निकलना,
शाम घड़ी के साथ ही घर,
दिन भर दुनिया से मिलते हैं,
अपनों को मिलते पल भर।

वक़्त बचाने दौड़ रहे थे,
वक़्त ही हमसे रूठ गया,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

महानगर से मायानगरी तक,
अपना भी इक नाम हुआ,
ऊँची मंज़िल, ऊँचा ओहदा,
पूरा कितना काम हुआ।

दुनिया ने पहचान लिया पर,
ख़ुद से मिलना छूट गया,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

अब त्योहार भी आते हैं तो,
संदेशों में प्यार मिले,
स्क्रीन के छोटे-से आँगन में,
दूर खड़े परिवार मिले।

घर-घर दीप जले फिर भी क्यों,
वो उजियारा छूट गया,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

कभी किसी बरसात में अब भी,
मिट्टी जब महकाती है,
बंद पड़ी यादों की खिड़की,
चुपके से खुल जाती है।

आँखों में फिर गाँव उतरता,
मन बचपन में लौट गया,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

ऐसा भी तो नहीं कि हमने,
आकर सब कुछ खोया है,
मेहनत से जो आज मिला है,
हमने उसका बीज बोया है।

बस जो पाया गिनते-गिनते,
जो था अपना, भूल गया,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

बच्चों को वो राह मिली है,
जो हमको मिल पाई नहीं,
उनके पंख खुले हैं जितने,
अपनी उड़ान थी उतनी नहीं।

उनकी ऊँची उड़ान देखकर,
हर इक सपना फूल गया,
फिर भी दिल के किसी कोने में,
अपना बचपन छूट गया।

अब भी वक़्त अगर मिल जाए,
चलो कभी उस गाँव चलें,
दादा-दादी नहीं मिलेंगे,
उनकी यादों से तो मिलें।

उस आँगन में बैठ के देखें,
क्या सचमुच सब छूट गया?
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।

तरक़्क़ी की राहों पर चलते,
जीवन कितना बदल गया,
जो पाया वो अपना ठहरा—
जो छूटा, दिल में बस गया।

मंज़िल मिली, संसार मिला,
फिर भी मन कुछ ढूँढ़ गया,
आगे बढ़ते-बढ़ते जाने,
क्या-क्या पीछे छूट गया।
— संतोष कुमार शर्मा
 
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1 सप्ताह पहले

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