कभी दिल की मान कर सवाल न करना।
तुम बर्फ़ सी रहना अपना रूप न बदलना।।
एक जिन्दगी जीना चाहता रहा मसोस कर।
तुम उसकी सोच में जबर्दस्ती घर न करना।।
बाग में थे मुकद्दर फिर भी गिले-शिकवे रहे।
फूल खिलते बिखरते रहे गुफ़्तगू न करना।।
हमसफ़र हमकदम सोच में ही अच्छे लगते।
गर जुड़ाव महसूस करना फिर दूर न करना।।
आप से गर हो सके करीब में जरूर आना।
जरूरत मुझे भी 'उपदेश' तिरस्कार न करना।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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