आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शादीशुदा जिन्दगी की बात और होती।

                
                                                         
                            रिश्तेदार छूटने लगे तासीर बदल गई।
                                                                 
                            
अपनापन अब भी मगर मैं सम्भल गई।।

हर तरह की बात केवल अजीज करते।
खुशियो की तासीर में चाहत ढल गई।।

तलाशती है आँखें अब भी किलकारियाँ।
जो बेहिसाब गूँजती थी हवा में घुल गई।।

शादीशुदा जिन्दगी की बात और होती।
अल्हड़पन की सादगी अन्दर पिघल गई।।

लहजे की बेबाकी थमने लगी 'उपदेश'।
बिना किसी शर्त के किस्मत बदल गई।।

- उपदेश कुमार कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर