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सबक माने न मन

                
                                                         
                            कहने भर को बहुत सी राहें होती है।
                                                                 
                            
सबक माने न मन कई चाहें होती है।।

गुमसुम रह कर भी देख लिया हमने।
सिसकियों में भी अपनी आहें होती है।।

तुम्हारे रहते हुए दुख बगले झाँकते।
जब सामने मेरे मजबूत बाहें होती है।।

काश 'उपदेश' कोई कहने वाला हो।
रोने-धोने से कमज़ोर निगाहें होती हैं।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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