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प्रेम ही रहे अनंत

                
                                                         
                            प्रतीक्षा का पल-पल पूर्ण होते दिख जाए।
                                                                 
                            
फिर नजरों का दीपक खुशी से जगमगाए।।

तब न आरंभ हो न अंत प्रेम ही रहे अनंत।
हर एक अक्षर थमकर वहाँ मौन बन जाए।।

तब तुम और मैं नही बस हम परिभाषा हो।
ऐसे मौन में ही हमारी आत्मा एक हो जाए।।

फिर जरूरत नही बार-बार चेहरा पढ़ने की।
मौन में चाँदनी का रंग अनायास चढ जाए।।

आगोश में लेकर मदहोशी से सराबोर जिस्म।
सारी खुशियाँ समेटकर आँचल खिल जाए।।

मन ही मन से पूछे कौन किसको पिरो रहा।
मिलन की इस घड़ी में 'उपदेश' गुम हो जाए।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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5 घंटे पहले

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