किसकी जिंदादिल दुआओ की आन को।
वह उजाड़ गया फलते फूलते मकान को।।
ऐसा माना जाता खुदा के रहम से समाज में।
सूचीबद्ध किया गया हर तरीके के दान को।।
किस तरह का विकास सिर पर थोक व्यापारी।
लूटा बेझिझक छुपाकर उनकी पहचान को।।
जिस नाम से महकती थी रूह मेरी यहाँ।
खुले में बाथरूम को सौप दिया अनजान को।।
किरणो को डर लगा मेरी छत पर आने से।
सैनिकों ने घेरा 'उपदेश' उजाड़े मकान को।।
बहुत कुछ संविधान में बनाया जा रहा है।
प्रयास जारी चल रहा अनकहे सम्मान को।।
- उपदेश कुमार शाक्यवार 'उपदेश'
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