पीड़ित मन हमेशा ही दया का पात्र नही होता।
परिस्थितियाँ झेलते-झेलते भी नम नही होता।।
मायाजाल में रहकर भी बाहर निकलने लगता।
पर जीवन के यथार्थ के अनुकूल धन नही होता।।
जीते जी मोह से निकल पाना क्या मोक्ष नही।
वैराग्य का बीज कसमसाता अंकुरित नही होता।।
सकारात्मक और नकारात्मक विचारो का द्वंद।
दुखी मन की गहराई में कोई अपना नही होता।।
थकने और हारने से बेहतर खुद ही ढूंढो 'उपदेश'।
घर बार त्याग कर के अंदरूनी श्रापित नही होता।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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