वाणी से न्याय की साक्षी बनी रही।
सारी जिम्मेदारी जैसे खुद की रही।।
कान खड़े होने लगे सुनकर भड़ास।
हर शब्द विष में लिपटा बखानी रही।।
सुनकर भभक गया अन्दर में सन्नाटा।
इतनी चिंगारी के बाद भी कुर्बानी रही।।
हर वक्त सुनना अधूरा प्रायश्चित मेरा।
संस्कारी के साथ उसकी दिवानी रही।।
फेरे लिए उनको हक दिलाने के लिए।
तकरार के मोड़ पर 'उपदेश' रानी रही।।
घर तब तक सलामत जब तक मौन है।
ऐसी व्यथित नारी की मेहरबानी रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X