जिसको घर समझ कर सजदे किये।
वो मकबरे की दीवारें मेरा खून पिये।।
मुसाफिर आकर ठहरा करते थे जहाँ।
उनमें रहकर ठहरने वाले ही न जिये।।
लोग कहते हैं वक्त गुजर जाया करते।
साथ के लम्हे गम भर-भर के न जिये।।
नशा कैसा भी रहा उतर जाया करता।
सफर पूरा न हुआ आराम से न जिये।।
हर एक समझौते पर दखल 'उपदेश'।
दिन की नज़रों से उतरें उजाले न जिये।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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