तहजीब की बातों से किसका पेट भरा।
कोई हकीकत में अपने ही चूल्हे से जरा।।
मन के बहकावे में आकर भटकता रहा।
सहरा की हवा में क्या कुछ ढूँढता फिरा।।
घर के खाने से ज्यादा चटपटा हो पसन्द।
खर्च करने पर भी ना आया स्वाद खरा।।
लिखने को तो लिख दूँ हकीकत अपनी।
कोरे हिसाब से पाया खुद को ही अधमरा।।
तकिया भिगोया रात में ख्वाब ही मिले।
बंद आँखों से 'उपदेश' जबाव रहा अधूरा।।
वो खुद भी फरेबी चेहरे पर सजा लिये।
तल्खी में दिल रहा, नायाब ख्वाब से भरा।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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