तुम खुद ही बन गए थे सीढ़ी मेरी।
छोड़कर गए दुविधा में पीढ़ी मेरी।।
इन आँखों पर मत जा सोई नही।
पत्थर के बुत सी नींद गाढ़ी मेरी।।
ज़माना चोट पर चोट करता रहा।
इसलिए चाले प़ड रही टेढ़ी मेरी।।
ज़ख्म सूखता नही दर्द बढ़ा रहा।
लाइलाज होने से विपत्ति बढ़ी मेरी।।
अब घरौंदा भी घर सा नही लगता।
'उपदेश' सुनने की चाहत बढ़ी मेरी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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