मैं खुद की बनाई सीमाओं में साँस ले रही।
लड़की की परछाई बनकर एहसास ले रही।।
सदियों से मेरे हिस्से में जो तहजीब मिली।
तहजीब की खामोशी को अनायास ले रही।।
इज़्ज़त के खातिर कैद में रहने के बावजूद।
सूरज तक पहुँचने के लिए अभ्यास ले रही।।
लोग कहते है पराये घर में पराई राय मानो।
पराया बताने वालों का पूरा व्यास ले रही।।
कभी तो खुद के नाम की भी दुनिया होगी।
सब के साथ रहते हुए 'उपदेश' श्वास ले रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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