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जिनकी ग़ज़ल पढ़कर महबूब दिल हारे

                
                                                         
                            जिनकी ग़ज़ल पढ़कर महबूब दिल हारे।
                                                                 
                            
तड़पना बढ़ गया आँखों ने झरने उतारे।।

नमक के बिना स्वाद उभर के नही आता।
ख्वाबों में ही रहे जाने कितने हँसी नजारे।।

चाहत रही मोहब्बत में उजली हँसी की।
बिना धूप की बारिशें करती कुछ इशारे।।

मंझधार में हम थे नही गुज़ारिश तुम्हारी।
डूबते को उबारो तुम दूर मुझसे किनारे।।

तुम्हारा साथ मिल जाता नसीब से अगर।
फिर हो जाते जिन्दगी के भी बारे-न्यारे।।

उनकी बातों के दाँव-पेच बिचलित करते।
यादों में जिंदा रहे 'उपदेश' के सपने सारे।।
-- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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2 महीने पहले

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