फ़ूलों की महक को अनदेखा कर तोड़ते।
चढा कर उनको किसके सम्मान से जोड़ते।।
जीते जी इन्साफ़ माँगता रहा हाथ जोड़कर।
नाइंसाफी की आहट को शैतान से जोड़ते।।
इंसान की वज़ह से इंसान आँसू बहाता रहा।
हर बेदर्द उसकी कहानी कानून से जोड़ते।।
मरे हुए इंसान को क्या मालूम कौन रोया।
जिन्दा रहने वाले लोग अभिमान से जोड़ते।।
अच्छे लोगों को याद कर सीख लेनी चाहिए।
दिखावा करने वाले लोग बेईमान से जोड़ते।।
जिन्दा इंसान माँगने लगा इंसान से 'उपदेश'।
पाखंड के दरबार में इसे भगवान से जोड़ते।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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