आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दर्द से भर गए कहाँ अमन रहे।।

                
                                                         
                            जिसकी रोशनी से रोशन रहे।
                                                                 
                            
उसको बेशक कहते मून रहे।।

अँधेरी रात हुई जब छुपने पर।
बैठे बैठे काट दी रात मौन रहे।।

खुली हवा में उड़ना चाहा मन।
धड़कन थाम कर कैसे चैन रहे।।

जग जाहिर हो गया सपना मेरा।
दर्द से भर गए कहाँ अमन रहे।।

अब वो मेरी नजर का हो जाए।
तब शायद 'उपदेश' चमन रहे।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर