अफवाहों के बाजर में इज़्ज़त उछल रही।
तुम्हारे प्रेम से 'उपदेश' किस्मत बदल रही।।
स्वागत-सत्कार किसी इज़्ज़तदार की तरह।
अन्दर से ताकती भरोसे की हवाएँ चल रही।।
दुनिया उलझी है मुझको क्या मैं उलझा नही।
मेरी सादगी से पड़ोसियों में चहल-पहल रही।।
अब मशविरे उनके फीके पड़ते जा रहे यारो।
इस तरह ज़माने में उनकी उथल-पुथल रही।।
किसी तरह से बाजार कीमत गिरा न सका मेरी।
अफवाहों के बाजर में शक-सुआ की पहल रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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