मूल है जो संसार का,
व्यर्थ पड़ा है आज।
अंकुर का जो आधार था,
वीरान पड़ा है आज।
एक व्यथा,
जिसे सबने झुटलाया है!
आज उसी के विरुद्ध,
मैंने यह कलम उठाया है!
उसका भी एक वर्ष जन्म हुआ,
प्रथम वर्षगांठ संपन्न हुआ।
पग पर चलना सीख लिया,
तुतला कर पहला शब्द दिया,
अस्पष्ट शब्द स्पष्ट हुआ,
द्वितीय वर्षगांठ संपन्न हुआ।
प्रकृति से उसने ज्ञान लिया,
बुद्धि विकास का प्रमाण दिया,
अस्पष्ट परिवार स्पष्ट हुआ,
तृतीय वर्षगांठ संपन्न हुआ।
पग दहलीज के पार गए,
कल्पना के स्वर्णिम द्वार खुले,
तथा,
देखते ही देखते...
कई वर्षगांठ संपन्न हुए।
चरम में आई तरुणाई,
मुख में दर्शित हुई अरुणाई।
संतुष्टि में था उसका जीवन,
परंतु...
बुरी दृष्टि में था उसका यौवन।
सब खतरों से अंजान,
वह आज भी पंख फैलाती है।
दैनिक जीवन की भाँति,
आज भी उड़ान भरने जाती है।
परंतु पंछी कहाँ तक बच पाया,
जब आखेटक ने जाल बिछाया है।
क्षतिग्रस्त हुई उसकी काया है,
निरंतर बचाव की गुहार पर ,
चुप्पी का ज्ञान दोहराया है।
जिन पगों की पहुँच अपार थी,
वह मर्यादा में बाँध दिए,
जो मानव जीवन की आधार थी,
स्वयं मानव ने उसपर घात किए।
इतना कुछ सब कुछ जानकर,
कलम क्यों न उठाऊँ मैं?
समाज के क्रूर व्यवहार पर,
क्यों न अंकुश लगाऊँ मैं?
क्यों न अंकुश लगाऊँ मैं!
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