कविता
इस गम भरी दुनिया में,
दो पल की खुशी पाने को,
हम लौट के घर आते हैं,
घर की खुशी पाने को।
मुट्ठी भर वक्त मिला है,
जिवन के सागर से।
इसमें भी शिकवा गिला है,
कहते हैं पाकर के ।
हम रूठ कर दूजे से,
मन मार लिए होते हैं।
छोटी सी बातों को,
अम्बर पर सिये होते हैं।
कुछ तेरी भी गलती है,
कुछ मेरी भी गलती।
बातों से सवर जाते हैं,
गर गलती को माने तो।
इस ग़म भरी दुनिया में ……
कितना उलझा जिवन है,
इस दौड़ भाग में देखो।
दो पल मिलता ना है,
करने को बातें भी तो।
चोरी से चुपके से,
हम आते हैं जताने को।
घर से दूर हो कर भी,
घर में मिल जाने को।
क्या सोच कर आते हैं,
क्या घर में पाते हैं।
तनहा तो पहले भी थे,
तनहा ही हो कर जाते हैं ।
इस ग़म भरी दुनिया में,
दो पल की खुशी पाने को।
हम लौट के घर आते है,
हम लौट के घर आते हैं,
घर की खुशी पाने को ।
इस ग़म भरी दुनिया में ……
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