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सवाल ज़िंदा हैं

                
                                                         
                            चुप करा दिए गए जो होठ, वो मलाल ज़िंदा हैं,
                                                                 
                            
तुम्हारी बंदूकों के साए में भी, कुछ सवाल ज़िंदा हैं।
तुम अतीत के पन्नों से रोज़ एक नया मुर्दा उखाड़ते हो,
नफरत की स्याही से तुम रोज़ जहर फैलाते हो,
मगर जो आज भूखा है , उस भूखे का पेट खाली है,
तुम जिसे 'विकास' कहते हो, वो सिर्फ चंद हाथों की ताली है।
सत्य से विलग जो हो जाए, वो परंपरा कैसी?
जो सच बोलने पर बेड़ियाँ डाल दे, वो व्यवस्था कैसी?
तुमने कुर्सियों को बचाने के लिए देश को बांट दिया,
जिसने भी आईना दिखाया, उसका ही नाम काट दिया।
तुम गद्दार कहो, या बागी लिखो दफ्तर के कागज़ों में,
पर सच की गूंज बिकी नहीं है आज भी बाज़ारों में।
तुम लाख पहरे बिठा दो इस दौर के सवालो पर,
पर याद रखना...
जब तक अन्याय है, तब तक बगावत के ख्याल ज़िंदा हैं,
तुम कुर्सी संभालो हुक्मरान, सवाल अभी भी ज़िंदा हैं!
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2 महीने पहले

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