जब-जब सावन आता है,
समय अपने भीगे हुए पन्ने फिर से खोल जाता है।
आकाश से गिरती हर बूंद,
मानो अनंत का कोई मौन संदेश हो,
जो धरती नहीं,
मन की सूखी परतों को भिगोने आती हो।
वृक्षों पर उगती हरियाली,
सिर्फ़ ऋतु का परिवर्तन नहीं,
यह बताती है कि
मृत प्रतीत होने वाली शाखाएँ भी
जीवन का विश्वास नहीं छोड़तीं।
नदियाँ बहती नहीं,
वे हमें बहना सिखाती हैं।
बादल बरसते नहीं,
वे अपने अस्तित्व का भार त्यागते हैं।
और मिट्टी महकती नहीं,
वह अपने भीतर छिपे धैर्य का उत्सव मनाती है।
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