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छानी का वैभव

                
                                                         
                            क्यों जले जा रहे, है अटल वह खड़ी।
                                                                 
                            
घास की झोपड़ी, अक्ल की खोपड़ी।।

रात दिन सोचते, आग कैसे लगे।
हैं स्वयं जल गए, सोच पाले सड़ी।।

है अटारी मगर, चैन फिर भी नहीं।
प्रेम है बांटती, हर घड़ी दो घड़ी।।

धन बढ़ा तो बढ़ी, दूरियाँ हर तरफ़।
मुस्कराती रही, बेफिकर वो अड़ी।।

धूप बारिश हवा, चाहती रौद लूंँ।
जीत पाई नहीं , ताकतें थी बड़ी।।

शीश नीचे किए, श्री महल भी कहे।
आज मैं हूँ खड़ा, जब कही वो लड़ी।।

चाह छोटी जहां, हर्ष उल्लास है।
पेट भरते सभी, पाव हो या धड़ी।।
-त्रिलोचन जोशी
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2 महीने पहले

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