बुनियाद जिसकी हमने रखी अपने खून से,
अब लोग पूछने लगे, "मक़्सद तुम्हारा क्या?"
जो कल तलक खड़े थे यहाँ हाथ जोड़कर,
कहते हैं आज हमसे, "तजुर्बा तुम्हारा क्या?"
नन्हे परिंदों को ऊँची उड़ान मिली,
मालिक की सरपरस्ती का जादू ही ऐसा था।
हम ढल गए तो महफ़िल ने आँखें बदल लीं,
पूछा न किसी ने कि अब हाल तुम्हारा क्या?
दीवार-ओ-दर को सींचा था जिस शख़्स ने यहाँ,
आज उस वजूद को ही भुलाया जा रहा।
पसीने की स्याही से लिखी थी जो दास्ताँ,
कहते हैं हुक्मरान, "वो पन्ना पुराना था।
शर्मिंदा हो रहा है हुनर अपनी साख पर,
सस्ता हुआ है दाम यहाँ खुशामदी का।
कटती रही है शाख मगर चुप खड़े हैं हम,
इस शहर से रिश्ता ही कुछ ऐसा था।
हम नींव के पत्थर हैं, मलाल कुछ नहीं,
दिक्क़त ये है कि ढह रहा है साया मकान का।
-वेंकट श्रीनिवास
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