आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

समझदारी

                
                                                         
                            मनमानियां बहुत की थी बचपन में
                                                                 
                            
अब जिम्मेदारी उठाने का वक्त आया है
अपने सपनों से जो वादे किए थे
उन्हें निभाने का वक्त आया है
नहीं पड़ना मुझे इस ज़माने के फसाने में
अब समझदारी दिखाने का वक्त आया है
से फ़िक्र थे जब पापा की उंगली थाम कर चलते थे
अब अपने पैरों पर खड़े होकर चलने का वक्त आया है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर