मनमानियां बहुत की थी बचपन में
अब जिम्मेदारी उठाने का वक्त आया है
अपने सपनों से जो वादे किए थे
उन्हें निभाने का वक्त आया है
नहीं पड़ना मुझे इस ज़माने के फसाने में
अब समझदारी दिखाने का वक्त आया है
से फ़िक्र थे जब पापा की उंगली थाम कर चलते थे
अब अपने पैरों पर खड़े होकर चलने का वक्त आया है
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