आज फिर मैंने कलम उठाई दिल मैं एक उमंग सी छाई लिख दूं अपने बारे मे सपनों के द्वारे में
मैं एक ऐसी पँछी हूं जो आजाद तो है पर उड़ ना पाए
पंख तो है पर फड़फड़ा ना पाए और कोई नहीं मैं हूँ एक स्त्री मैं ही जननी मैं ही सारथी मैं ही बेटी मैं ही चीज पराई आज फिर मैंने कलम उठाई
सबको दिया सम्मान बहुत खुद के लिए कुछ ना पाया
निराशा के अंधकार में साहस का मैंने दीप जलाया
सबकी छोटी बड़ी जरूरत का ध्यान रखा खुद की
छोटी सी गलती की सज़ा पायी आज फिर मैंने कलम उठाई
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