आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं हूँ हिंदी

                
                                                         
                            मैं केवल अक्षर-विन्यास नहीं,
                                                                 
                            
मैं शताब्दियों का संस्कार हूँ,
मैं भारत के कंठ से निकला
अनश्वर-सा एक उद्गार हूँ।
मैं वेदों की गूँज नहीं केवल,
मैं लोकगीत की तान भी हूँ,
मैं तुलसी की चौपाई में,
मीरा के उर की जान भी हूँ।
मैं कबीर की निर्भीक वाणी,
मैं सूर का वह भाव अमर,
मैं रसखान की कृष्ण-भक्ति,
मैं रहीम का निर्मल स्वर।
मैं धूल सनी उन पगडंडियों की
माटी का अभिमान हूँ,
मैं माँ की पहली लोरी में
घुलता हुआ अरमान हूँ।
कहीं बुंदेली की माटी है,
कहीं मैथिली का मधुमास,
कहीं राजस्थानी मरुभूमि में
लोकधुनों का उल्लास।
मैंने अरबी की खुशबू रख ली,
फ़ारसी का रंग सँजोया,
उर्दू की नज़ाकत ओढ़ी,
पर अपना अस्तित्व न खोया।
तुर्की, द्रविड़, पाली, प्राकृत—
कितने स्वर मुझमें samaye,

मैं हिंदी हूँ—
मैं मिलन की वह रीत पुरानी,
जिसमें ‘मैं’ से ‘हम’ बनता है,
जिसमें अपरिचित भी अपना,
जिसमें पराया मन बसता है।
जब कोई परदेस की धरती पर
भारत को याद करता है,
एक परिचित-सा हिंदी शब्द
आँखों में नीर भरता है।
तब समझो—
भाषाएँ केवल बोली नहीं जातीं,
कुछ भाषाएँ जी जाती हैं,
कुछ शब्द काग़ज़ पर नहीं रहते,
वे धड़कनों में सी जाती हैं।
और मैं—
मैं उन्हीं धड़कनों की भाषा हूँ,
विस्मृत होती स्मृतियों के
अंतिम दीप की आशा हूँ।
मेरे स्वर में खेतों की हरियाली,
मेरे छंद में गंगा की धार,
मेरी ध्वनि में मंदिर की घंटी,
मेरे मौन में माँ का प्यार।
मैंने रण में शौर्य सुना है,
मैंने विरह में आँसू गिने,
मैंने उत्सव में दीप जलाए,
मैंने शोक में मौन सिले।
इसलिए मेरा गौरव केवल
इतना नहीं कि मैं ‘हिंदी’ हूँ—
मेरा गौरव यह है कि सदियों से
मैं भारत को कहती आई हूँ।
कभी प्रेम बनकर,
कभी प्रतिरोध बनकर,
कभी प्रार्थना, कभी पुकार बनकर,
कभी क्रांति की हुंकार बनकर।
और यदि कभी कोई पूछे—
“तेरी सबसे बड़ी पहचान क्या?”
तो मैं मुस्काकर कह दूँगी—
न मैं केवल देवनागरी हूँ,
न केवल व्याकरण का विधान हूँ,
मैं उस भारत की जीवित स्मृति हूँ
जिसका हर कण मेरा प्रमाण है।
मैं हूँ तो तुलसी का राम है,
मैं हूँ तो कबीर की आग,
मैं हूँ तो मीरा का माधुर्य,
मैं हूँ तो जनमन का राग।
इसलिए मुझे केवल
“भाषा” कहकर मत पुकारो—
मैं विरासत हूँ,
मैं वाणी हूँ,
मैं स्मृति हूँ,
मैं कहानी हूँ।
मैं केवल अतीत की शेष धरोहर नहीं,
मैं भविष्य का भी विस्तार हूँ—
और जब तक इस धरती पर
किसी माँ की लोरी गूँजेगी,
किसी किसान की साँस चलेगी,
किसी कवि की कलम उठेगी—
तब तक मेरे अक्षर-अक्षर में
यह माटी बोलती रहेगी।
तब तक मेरे स्वर में
यह भारत डोलता रहेगा।
और तब तक मैं कहती रहूँगी—
मैं शब्द नहीं—
तुम्हारी संवेदना हूँ।
मैं भाषा नहीं—
तुम्हारी आत्मा का उच्चार हूँ।
मैं हिंदी हूँ।
और इसी में मेरा संसार है।
मैं हिंदी हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर