मैं तुझसे मिलने का, कोई बहाना ढूढ लेता हूँ
घने ज़ंगल गड़ा- भूला, ख़जाना ढूंढ लेता हूँ
सितम – ज़ुल्मों बनी, तेरी गली, लेकिन ज़ुदा हो के
नसबो में लिखा ,अपना ,घराना ढूंढ लेता हूँ
न भाये है,हमें तारीफ़ के, पुल से ग़ुजरना भी
शराफ़त से झुकाने सर, निशाना ढूंढ लेता हूँ
अगर नज़दीक आने में हिचक थी कोई कभी तुमको
वज़ह पूछे बिना भीतर, फ़साना ढूंढ लेता हूँ
अग़र करवट, बदलता वक्त भी मेरे नसीबों सा
मै पेचो ख़म में, उलझा- खत पुराना ढूंढ लेता हूँ
मुझें बेकार समझे हो , भले लोगो अभी मानो
क़दर पाने, कहीं महफ़िल, ठिकाना ढूंढ लेता हूँ
छिपाओ लाख, बादल- बिजलियां ,ख़ुशबू हवा भी तुम
हक़ीक़त कहते ज़ुमलों में, ज़माना ढूंढ लेता हूँ
-सुशील यादव दुर्ग
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