मेरे हिस्से जब कभी, शीशे का घर आता है
क्यों अचानक हाथ में , तेरे पत्थर आता है
पास रखता था यहाँ ,मैं दिखाने आइना
आफ़तों लिपटा हुआ , लौट मंजर आता है
एक आफत वो हमें,रोज चिपकाता रहा
आँख के वो सामने, जाँच दफ़तर आता है
मुझको है मालूम भी, जुर्म की इक- इक सजा
जब धुआँ हो आसमा, वो कतर पर आता है
बस यही काफी है मुझे , देखता है प्यार से
जाहिलों के शहर में , कौन अक्सर आता है
हम यहाँ भटके हुए , तुम वहां रोते मिलो
ऐसा मौका कब यहाँ , कोई दिन भर आता है
इस सियासत से कभी , भाई तुम उलझो नहीं
बाद में क़ानून का , खूब चक्कर आता है
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