इक मुसाफिर हूँ मुझे याद पुराने आते
राह गुजरे हुए बरसो के जमाने आते
लोग नजदीक मिरे वो ही हुआ करते जो
रोज अखबार में किस्सों के बहाने आते
आज मौसम हुआ बदनाम न जाने कैसे
कोई तूफान न था पेड़ हटाने आते
वो विरासत नहीं पाया कभी हिस्सा हमने
लाख दुनिया के कहीं हाथ खजाने आते
अब तुम्हारा ही बदलना रहा बाकी हम पर
सोच के हमको यही ख्वाब सताने आते
हम गिरे जाते हैं नज़रों से कभी खुद के ही
एक अफसोस यूँ ही लौट थकाने आते
आज बरसात में भटके हैं बिना छतरी के
तेरी यादों के ये बौछार भिगाने आते
मामला दिल का था सुलझा नहीं हमसे अच्छा
काश हमको कहीं तो लोग मनाने आते
आग लगती रही सीने में बुझा देती तुम
हम बुलाते यहाँ किसको जो बुझाने आते
-सुशील यादव दुर्ग
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