आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इक मुसाफिर हूँ मुझे याद पुराने आते

                
                                                         
                            इक मुसाफिर हूँ मुझे याद पुराने आते
                                                                 
                            
राह गुजरे हुए बरसो के जमाने आते

लोग नजदीक मिरे वो ही हुआ करते जो
रोज अखबार में किस्सों के बहाने आते

आज मौसम हुआ बदनाम न जाने कैसे
कोई तूफान न था पेड़ हटाने आते

वो विरासत नहीं पाया कभी हिस्सा हमने
लाख दुनिया के कहीं हाथ खजाने आते

अब तुम्हारा ही बदलना रहा बाकी हम पर
सोच के हमको यही ख्वाब सताने आते

हम गिरे जाते हैं नज़रों से कभी खुद के ही
एक अफसोस यूँ ही लौट थकाने आते

आज बरसात में भटके हैं बिना छतरी के
तेरी यादों के ये बौछार भिगाने आते

मामला दिल का था सुलझा नहीं हमसे अच्छा
काश हमको कहीं तो लोग मनाने आते

आग लगती रही सीने में बुझा देती तुम
हम बुलाते यहाँ किसको जो बुझाने आते
-सुशील यादव दुर्ग
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर