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"बस सिलसिला रह गया"

                
                                                         
                            हर ख़ुशी का सिलसिला बस देखता रह गया,
                                                                 
                            
मैं तेरे वादों पे आखिर ऐतबार रह गया।

वक़्त ने ऐसे मिटाए फ़ासलों के सब निशाँ,
नाम मेरा सिर्फ़ दिल की दास्ताँ रह गया।

शहर भर में बिक रहे थे आदमी किरदार भी,
एक मेरा ज़र्फ़ ही बेदाम-सा रह गया।

जिसने सच की राह में हर मोड़ पर ठोकर सही,
वो ज़माने की नज़र में बेवजह रह गया।

ख़्वाब आँखों में सजाए उम्र पूरी कट गई,
हाथ में ताबीर का इक आईना रह गया।

दौर-ए-नफ़रत में वफ़ाओं की सदाएँ क्या मिलीं,
हर तरफ़ बस चीख़ का ही सिलसिला रह गया।

ताज वालों की कहानी हर ज़ुबाँ पर छा गई,
एक मज़दूरों का पसीना अनकहा रह गया।

धूप ने झुलसा दिए रिश्तों के सारे गुलसिताँ,
याद का इक पेड़ लेकिन हरा-भरा रह गया।

हमने अपने दर्द को लफ़्ज़ों में ढाला इस तरह,
हर ग़ज़ल में दिल का कोई हादिसा रह गया।

मौत भी आई तो ख़ाली हाथ ही वापस गई,
नाम का ही आदमी के पास दिया रह गया।

'बाबरा' सच की शमअ जलती रही हर दौर में,
झूठ का महल देखकर ख़ुद ही धुआँ रह गया।

 
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2 महीने पहले

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