दिल के वीराने में पुर-नूर सा इक ख़्वाब हो तुम,
मेरी तारीक शबों का खुला महताब हो तुम।
देख कर जिसको सुकूँ पा जाए ये वीरान नज़र,
तिश्ना होंठों के लिए अमृत-ओ-शीरीं आब हो तुम।
जिस की ख़ुश्बू से महक उठती है अहसास की रुत,
सहन-ए-उम्मीद में ताज़ा खिला इक गुलाब हो तुम।
जिस को लफ़्ज़ों में पिरोने से क़लम डरता है,
साफ़ आईने की मानिंद छुपा हिजाब हो तुम।
पूछते हैं जो ज़माने में सबब जीने का,
मेरी हर बात का, हर साँस का जवाब हो तुम।
आसमाँ झुक के करे रश्क तिरी पाकी पर,
दश्त-ए-फ़ुर्क़त में उतरता हुआ सहाब हो तुम।
लाख चेहरे हों निगाहों के तक़ाज़े पे मगर,
मेरी ख़ामोश तमन्नाओं का इंतिख़ाब हो तुम।
जिस की तासीर से ज़िंदा है सुख़न ऐ 'बाबरा',
मेरी ग़ज़लों का मुक़द्दस तरीन शबाब हो तुम।
- सुशील कुमार 'बाबरा'
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