जो सच की राह चलते हैं उन्हें लश्कर से क्या लेना,
ख़ुदा जब साथ हो अपने तो फिर ख़ंजर से क्या लेना।
जहाँ इंसाफ़ का परचम लहू से सींच रक्खा हो,
अना-परवर को बातिल के किसी तेवर से क्या लेना।
फ़क़ीरी में जो पाया है वो दौलत में नहीं मिलता,
हवस की भूख वालों को मिरे बिस्तर से क्या लेना।
हवाएँ लाख ज़ालिम हों चराग़ाँ हम जलाएँगे,
उड़ानों के मुसाफ़िर को शिकस्ता पर से क्या लेना।
ज़मीर-ए-बा-वफ़ा को जब झुकाया ही नहीं हमने,
ग़ुलामी के भरे-पूरे किसी भी दर से क्या लेना।
पसीने की कमाई से ही रोशन है मिरा चौका,
फ़रेबी रोटियों के ढेर और ज़र से क्या लेना।
अदब की अंजुमन में जो क़लम की आबरू रक्खे,
सुख़नवर को ज़माने के किसी रहबर से क्या लेना।
मुक़द्दर की लकीरें ख़ुद तराशी हैं मशक़्क़त से,
सितारों की सियाही और मुक़द्दर से क्या लेना।
जला कर रात की तारीकियाँ सूरज उगाया है,
उजाले के मुजाहिद को शब-ए-मंज़र से क्या लेना।
तपा कर रूह को कुंदन बनाया इश्क़ के दम पर,
हमें दुनिया के मद्धम काँच और गौहर से क्या लेना।
सदा हक़ की बुलंद आवाज़ में गाते रहो 'बाबरा',
जो बा-किरदार हैं उनको किसी पत्थर से क्या लेना।
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