गज़ल
लब ख़ामोश हैं मगर वो आँखों से कह रहे हैं,
दिल के तमाम अफ़्साने आँखों से कह रहे हैं।
पर्दा हया का रुख़ पर ताने हुए खड़े हैं,
राज़-ए-निहाँ छुपा के आँखों से कह रहे हैं।
मुद्दत से जो ज़ुबाँ पर आ ही नहीं सका था,
वो क़िस्सा-ए-मोहब्बत आँखों से कह रहे हैं।
हम से ख़फ़ा हैं लेकिन नज़रों में प्यार भी है,
रूठी हुई अदा से आँखों से कह रहे हैं।
रोके से रुक न पाए अश्कों के जो सितारे,
हिज्र-ओ-फ़िराक़ का ग़म आँखों से कह रहे हैं।
दामन बचा के हमसे गुज़रे वो अंजुमन में,
मजबूरियों की बातें आँखों से कह रहे हैं।
तीर-ए-नज़र चला कर घायल किया है दिल को,
तीखे वो सब तराने आँखों से कह रहे हैं।
महफ़िल में दुश्मनों की जब बात चल न पाई,
चुपके से इक इशारा आँखों से कह रहे हैं।
इकरार भी वही है इंकार भी वही है,
उलझन में दिल फँसा के आँखों से कह रहे हैं।
आँधी में जैसे कोई जलता दिया सँभाले,
उम्मीद का भरोसा आँखों से कह रहे हैं।
अशआर में पिरोया है दर्द-ए-निगाह तूने,
सब राज़ आज 'बाबरा' आँखों से कह रहे हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X