आईने में जो ख़ुद को शेर समझते हैं,
गर्दिश-ए-वक़्त में वो ज़ेर समझते हैं।
रस्सियों में जकड़ा है जिन का वजूद सारा,
वो ख़ुद को जंगल का दलेर समझते हैं।
ढेंचू की आवाज़ पे नाज़ है जिन्हें इतना,
दहाड़ के हर लफ़्ज़ को ढेर समझते हैं।
घास चरने की जिनकी औक़ात है दुनिया में,
शिकार के हुनर को वो अंधेर समझते हैं।
ज़ेहन में पाल रक्खा है बादशाहत का भरम,
तख़्त-ए-जहालत को वो कुबेर समझते हैं।
हुनर के मयख़ाने में जब ना-अहल आ बैठें,
अदब के तराज़ू में वो फेर समझते हैं।
हक़ीक़त की कसौटी पर टिक नहीं पाते जो,
सच्चाई की बात को ज़हर-ए-हेर समझते हैं।
अपनी ही तारीफ़ में दिन-रात जो मगन हैं,
दूसरों की ख़ामोशी को वो देर समझते हैं।
उतर जाएगा ये नशा जब ठोकरें लगेंगी,
आईने के फ़रेब को जो सवेर समझते हैं।
गुमाँ की ओट में छुपती नहीं कभी असलियत,
नादान जो ख़ुद को ही शमशीर समझते हैं।
तंज़ के नश्तर से सच लिख दिया ऐ 'बाबरा',
तिरे अशआर को वो तीरो-तबर समझते हैं।
- सुशील कुमार 'बाबरा'
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